भीष्म का दर्द


कुरुक्षेत्र में रक्त रंजित नदियाँ बह रही थी अविरल।

शवों का ढेर बढ़ रहा था  हर पल ,

एक सूरज रोज डूबता था आने को कल

और देवव्रत बाणों की शैया पर पड़ा था निश्चल।

पृथ्वी को रक्त से नहला रहे थे कुरु-पांडव

पर असल रक्त तो बहा रहा था भीष्म।

उनकी पीड़ा देख रो पड़ी गंगा मैया

पूछ पड़ी , क्यों नहीं त्यागते प्राण ??

समस्त वस्त्र में थे लहू के छीटें ,

बाण दे रहे थे पीड़ा।

पर मुख पर दिव्य तेज़ कर रही थी अलग ही क्रीड़ा। 

मैं तो यहाँ अपने वचन से बंधा हूँ।

अर्जुन की इस शैया पर लेटे लेटे ,

आने वाले सूरज का इंतज़ार कर रहा हूँ।

आने वाले सूरज को भी अँधियारा भगाना है।

यहाँ रुके रहना मेरी विवशता है।

दक्षिण में खड़ा यमराज ,

आज मुझपे हँसता है।

आप माँ होकर भी नहीं  समझी मेरा दर्द

मैं रोता रहा अपने भाइयों के शव पर।

करके अपने मन को कठोर

तोडा मैंने ख़्वाबों का हस्तिनापुर।

पर समझे नहीं मेरे पूर्वज मेरा दर्द

किसकी शिकायत करूँ , जब अपनोसे मिला ऐसा दर्द

जिन बच्चो को दिया अस्त्र का ज्ञान ,

आज उन्ही पर चलाये विषैले बाण।

अब इस अतीत के सूरज का अस्त होने वाला है।

नए सूरज के उदय का समय आने वाला है।

पर डरता हूँ फिर से ना टूट जाये ये घर मेरा

इसी लिए अभी तक रुका हूँ सह कर पीड़ा।

ऊपर आसमान के तारों ने सवाल करने शुरू किये है।

कब चलना है ?? आपके पथ को भी तो सजाना है।

सुनो !!! ठहर जाओ थोड़ा, मैं अभी ना जाऊंगा।

थोड़ा थक गया हूँ , पर हारकर ना आऊंगा।

सुनो अर्जुन !! जाने से पहले एक बात बतलाता हूँ।

मैं चला जाऊंगा , तभी इतिहास कहलाऊंगा।

मगर आने वाले कल की नींव

हमेशा इतिहास पर ही बनती है।

भले आकाश जितनी ऊंचाई छू लो ,

पर पाँव जमीं पर ही  पड़ती है। 

( यह कविता एक ऐसे पल में लिखा गया था जब मन के अन्दर के अजीब सा शोर था ..वो शोर जिसका न 7395_1कोई आरम्भ है और न ही कोई अन्त… महाभारत के रण भूमि पर सर सया पर पितामह भीष्म का भी कुछ ऐसा ही हाल था सोच के ये कविता उन्हीको समर्पित )

-अंशुमान कर

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