उठाया हूँ आज कलम….


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कुछ लिखने के लिए जब उठाता हूँ कलम

आँखों के सामने आती है हर वो ज़ुल्म

जिसको लोग कहते है उनका धरम

वेदों का तो उड़ रहा यहाँ धुआं और चिलम

कहते है प्रेम का नहीं होता कोई मज़हब

फिर भी प्रेम का गला घोट कर भरते है अधब

उन को मानते है हम गुरु ये बात है बड़ी अजब

जब जब किया किसी ने विरोध, मौत मिला उनको तब तब

कुछ लिखने के लिए जब उठाता हूँ कलम

याद आता है इन नेताओं की कसम

न होगी हिंसा न होगा अन्याय हमारा है ये धरम

७० साल के बाद भी हटा नही ये भरम

गीता की शपथ ले कर लोग अदालत में झूठ बोलते है

और फिर भी हम कहते है सत्य मेव जयते है

बचपन में जिन माँ-बाप का हाथ धरे चलते है

उन्ही को हम बुढ़ापे में छोड़ते , घर से निकालते है

कुछ लिखने के लिए जब उठाता हूँ कलम

बूढी कांपती हाथें पूछती है “क्या फूटे थे मेरे करम”

दंगा में हुई अनाथ पूछती है क्या मिलेगा मुझे मरहम

मज़हब के बुरखे से बाहर भी क्या होगा कोई धरम…

कलम के दम पर बनाई और बिगाड़ी जाती है इतिहास

बस कलम चलने वालों को होनी चाहिए इस शक्ति का एहसास

कलम से ही लाना होगा लोगों है खोया हुआ सहास

ये वो अस्त्र है जो करती सृष्टि में अन्नत विश्वास

हो रहा भावनाओं का आज मन्नन

कुछ लिखने के लिए आज उठाया हूँ कलम...

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अंशुमान कर

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