में हिंदू हूँ …

जब कोई पूछे मुझे कौन हूँ मैं,

जानना चाहता है वो कि क्या मजहब है मेरा,

लेकिन क्या आज इंसान का इंसान होना काफी नहीं?

कहने को तो पंथ अनेक हमारे,

लेकिन फिर अंतिम रहा तो एक ही है वही…

तो सुनो तुम पूछो यदि कौन हूँ मैं?

मैने गीता को है जीवन का सार माना,

वेदों को ईश्वर का वर्दान माना,

मैने तो कुरान से है प्रेम का पाठ सीखा,

बाईबल से भाई चारे की ली है दीक्षा,

ग्रंथ सहिब में ही है जीने का आधार,

आगम शास्त्र है दिव्य शांति का आधार…

शायद इसलिये मैने अपने आप को है हिन्दू माना…

फिर भी अगर तुम पूछो हिंदू कौन है?

तो सुनो…

माता-पिता है जहाँ पर भगवान,

गुरू को मिला है सम्मान महान,

मित्रों के साथ जहाँ होती है होली,

ईद हो या हो गुरू पर्व सजती हो जहाँ रंगोली,

सुख में और दु:ख में जहाँ सब साथ हैं,

वहीं सर्व धर्म का तीर्थ है,

मैं उसी ग्रह का निवासी हूँ

हाँ मैं हिंदू हूँ…।

अब बोलोगे की तुम हमारे हैं पंथ अनेक,

तो सुनो…

इस अनेकता में भी एकता बसती है,

बुद्ध और महावीर की वाणी यहीं शोभा पाती है,

क्या अल्लाह, क्या इशू सबसे प्यारे है गनपति,

गुरू में ब्रम्हा हैं, ब्रम्हा में नानक हैं,

यहीं तो शिव का तांडव है, कृष्ण की माया हैं,

हैं हमारे अनेक संत,

मोक्ष ही तो है हमारा एकलौता अंत।

समझा हूँ मैं इस ज्ञान को,

इसलिये तो गर्व से कहता हूँ,

हाँ में हिंदू हूँ …

मैं हिंदू हूँ…

अंशुमान कर

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